आष्टांग नमस्कारासन कैसे किया जाता हैं?

आष्टांग नमस्कारासन-

आष्टांग का अर्थ आठ अंगों सहित। नमस्कार का अर्थ प्रणाम करना। शरीर के आठों अंगों ( दोनों पैर, दोनों हाथ, दोनों घुटनों, छाती एवं ठुड्डी) को झुकाकर नमन करना या प्रणाम करना। इस कारण इस आसान को अष्टांग नमस्कारासन कहा जाता है।

इसकी स्थिति और सिद्धि के निमित्त कतिपय उपाय आवश्यक होते हैं जिन्हें ‘अंग’ कहते हैं और जो संख्या में आठ माने जाते हैं। अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पांच अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार) ‘बहिरंग’ और शेष तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) ‘अंतरंग’ नाम से प्रसिद्ध हैं। बहिरंग साधना यथार्थ रूप से अनुष्ठित होने पर ही साधक को अंतरंग साधना का अधिकार प्राप्त होता है। ‘यम’ और ‘नियम’ वस्तुतः शील और तपस्या के द्योतक हैं।

यम का अर्थ है संयम जो पांच प्रकार का माना जाता है : (क) अहिंसा, (ख) सत्य, (ग) अस्तेय (चोरी न करना अर्थात्‌ दूसरे के द्रव्य के लिए स्पृहा न रखना)। इसी भांति नियम के भी पांच प्रकार होते हैं : शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय (मोक्षशास्त्र का अनुशलीन या प्रणव का जप) तथा ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर में भक्तिपूर्वक सब कर्मों का समर्पण करना)। आसन से तात्पर्य है स्थिर और सुख देनेवाले बैठने के प्रकार (स्थिर सुखमासनम्‌) जो देहस्थिरता की साधना है। आसन जप होने पर श्वास प्रश्वास की गति के विच्छेद का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का लेना श्वास और भीतरी वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है।

प्राणायाम प्राणस्थैर्य की साधना है। इसके अभ्यास से प्राण में स्थिरता आती है और साधक अपने मन की स्थिरता के लिए अग्रसर होता है। अंतिम तीनों अंग मन:स्थैर्य का साधना है। प्राणस्थैर्य और मन:स्थैर्य की मध्यवर्ती साधना का नाम ‘प्रत्याहार’ है। प्राणायाम द्वारा प्राण के अपेक्षाकृत शांत होने पर मन का बहिर्मुख भाव स्वभावत: कम हो जाता है। फल यह होता है कि इंद्रियाँ अपने बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो जाती है। इसी का नाम प्रत्याहार है (प्रति=प्रतिकूल, आहार=वृत्ति)।

aashtaang namaskaraasan kaise kiya jaata hain.
(Aashtang Nmaskaarasan)

आष्टांग नमस्कारासन कैसे करें?

अष्टांग नमस्कारासन करने की विधि- पेट के बल उत्तर या पूर्व की दिशा की तरफ सिर करके लेट जाएं। दोनों पैर की अंगुलियों, दोनों घुटनों, दोनों हाथों की हथेलियों, छाती व ठुड्ड़ी यह सभी अंग प्रथ्वी को स्पर्श करें। यह आसन भगवान को साष्टांग नमस्कार करने जैसा ही हैं। श्वासक्रम ओर समय – स्वभाविक श्वास-प्रश्वास करें, अनुकूलतानुसार करें।

ध्यान करें-

  1. अपने इष्ट भगवान या गुरु का ध्यान करें।
  2. मूलाधार चक्र से उठती हुई शक्ति का ध्यान करें, जो कि सहस्त्रार की तरफ प्रभावित हो रही हैं। 
  3. शरीर के रोगों का नाश हो रहा हैं, ऐसा ध्यान करें।

अष्टांग नमस्कार के लाभ-

  • यह आसन मेरुदंड के रोगों में अति लाभदायक हैं।
  • यह आसन शरीर को पूर्ण आराम देता हैं एव नई चेतना का संचार करता हैं।
  • मानसिक शांति प्रदान करता हैं।
  • अष्टांग नमस्कार में दिशाओं का महत्व आध्यात्मिक कारणों से। एवं कुछ योग शिक्षक इस योग को प्रणिपातासन भी कहते हैं। 
  • अष्टांग नमस्कार करते समय शरीर को कई प्रकार से ऊपर लिखे फायदे तो होते ही हैं। इसके साथ ही, एक सबसे महत्वपूर्ण फायदा ये भी है कि, ये दिमाग को स्थिर रखकर आत्मविश्वास बढ़ाने में भी मदद करता है। 
  • जब स्थिरता और आत्मविश्वास एक साथ बढ़ते हैं तो नए योगी ऊर्जावान महसूस करते हैं। 
  • इस सकारात्मक ऊर्जा का इस्तेमाल रोजमर्रा के कामों में किया जा सकता है। 
  • योग अभ्यास करने का सबसे बड़ा फायदा ये भी है कि इससे आपको शारीरिक फायदों के साथ ही मानसिक फायदे भी मिलते हैं। 
  • यही फायदे आप इस योगासन को करके भी हासिल कर सकते हैं।

अष्टांग नमस्कार आसन करते समय सावधानियां- (Ashtang Namaskar Aasana Karte Samay Savdhaniya)

  1. रीढ़ की हड्डी में दर्द होने पर ये आसन न करें। 
  2. गंभीर बीमारी होने पर भी इस आसन को नहीं करना चाहिए। 
  3. गर्दन में दर्द होने पर अष्टांग नमस्कार नहीं करना चाहिए।
  4. स्लिप डिस्क के मरीज इस आसन का अभ्यास न करें। 
  5. कंधे में दर्द की समस्या होने पर हाथ ऊपर न उठाएं।
  6. घुटने में दर्द या आर्थराइटिस होने पर दीवार के सहारे ही अभ्यास करें। 
  7. दिल और हाई ब्लड प्रेशर के मरीज ये आसन न करें।
  8. शुरुआत में अष्टांग नमस्कार को योग ट्रेनर की देखरेख में ही करें। 
  9. संतुलन बनने पर आप खुद भी ये आसन कर सकते हैं।
  10. अष्टांग नमस्कार का अभ्यास शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

निष्कर्ष- 

  • अष्टांग नमस्कार योग विज्ञान का बहुत अच्छा आसन है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। अष्टांग नमस्कार न सिर्फ मेटाबॉलिज्म को एक्टिवेट करता है बल्कि आपके दिमाग को स्थिर रखने में भी मदद करता है। और आज की दुनिया में बैलेंस बनाकर रखना ही सबसे जरूरी चीज है। अष्टांग नमस्कार बैलेंस बनाने से जुड़ी इसी खूबी को आपके शरीर में विकसित करने में मदद करता है। 
  • अष्टांग नमस्कार का अभ्यास सुबह के वक्त ही किया जाना चाहिए। अगर शाम के वक्त ये आसन कर रहे हैं तो जरूरी है कि आपने भोजन कम से कम 4 से 6 घंटे पहले कर लिया हो। ये भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि आसन करने से पहले आपने शौच कर लिया हो और पेट एकदम खाली हो।
  • अष्टांग नमस्कार का अभ्यास करने के लिए आपके पैर और क्वा​ड्रीसेप्स इतने मजबूत होने चाहिए कि पूरे शरीर का वजन उठा सकें। लेकिन सबसे पहले आपको अपने मन के डर पर जीत हासिल करनी होगी कि कहीं आप अभ्यास करते हुए गिर न पड़ें। अगर गिर भी जाएं तो गहरी सांस लें और कोशिश के लिए अपनी तारीफ करें और दोबारा अभ्यास करें। शुरुआती दौर में इस आसन को करने के लिए किसी योग्य योग शिक्षक से मार्गदर्शन जरूर लें।

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