भ्रामरी प्राणायाम।

प्राणायाम:

“प्राणायाम” दो शब्दों के योग से मिलकर बना है- (प्राण + आयाम) पहला शब्द “प्राण” है। दूसरा शब्द है। “आयाम” प्राण का अर्थ जो हमें शक्ति प्रदान करता है एवं बल प्रदान करता हैं। आयाम का अर्थ जानने के लिये इसका संधि विच्छेद करना होगा क्योंकि यह दो शब्दों के योग (आ + याम) से बना है। इस में मूल शब्द “याम” है, ‘आ’ उपसर्ग लगा है। याम का अर्थ ‘गमन’ होता है। और “आ” उपसर्ग ‘उलटा’ के अर्थ में प्रयोग किया गया है, अर्थात आयाम का अर्थ उलटा गमन होता है।

अतः प्राणायाम में आयाम को ‘उलटा गमन के अर्थ में प्रयोग किया गया है। इस प्रकार प्राणायाम का अर्थ ‘प्राण का उलटा गमन होता है। यहाँ यह ध्यान देने कि बात है कि प्राणायाम, प्राण के उलटा गमन के विशेष क्रिया की संज्ञा है न कि उसका परिणाम। अर्थात प्राणायाम शब्द से प्राण के विशेष क्रिया का बोध होना चाहिये।

प्राणायाम योग के बारे में बहुत से ऋषियों ने अपने – अपने ढंग से बताया है, लेकिन सभी के भाव एक ही है, जैसे- पतन्जलि का प्राणायाम सूत्र एवं गीता में जिसमें पतन्जलि का प्राणायाम सूत्र महत्वपूर्ण माना जाता है जो इस प्रकार है-

तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम॥ इसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार होगा – श्वास प्रश्वास के गति को अलग करना प्राणायाम है।

(भ्रामरी प्राणायाम।)

विषय सूची-

भ्रामरी प्राणायाम।

भ्रामरी प्राणायाम: भ्रामरी शब्द ‘भ्रमर’ से निकला जिसका अर्थ होता है, एक गुनगुनाने वाली मधुमक्खी। इस प्राणायाम का अभ्यास करते समय नाक से एक गुनगुनाने वाली आवाज निकलती है, जो मधुमक्खी की आवाज से मिलती-जुलती है, इस लिए भ्रामरी प्राणायाम नाम इस योग का पड़ा है।

भ्रामरी प्राणायाम, हमारे स्वास्थ्य और मन की शांति के लिए बेहद जरूरी है। भ्रामरी प्राणायाम में ऐसे बहुत से आसन है जिनके अभ्यास से लाभ मिलता है, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे योगासन के बारे में बता रहे हैं जो न सिर्फ तनाव दूर करता है बल्कि नींद न आना, थकान महसूस करना और याददाश्त के कमजोर होने में काफी कारगर है। यही भ्रामरी प्राणायाम हैं।

आमतौर पर तनाव में रहना आज के समय में कोई बढ़ी बात नहीं है, लेकिन यदि यह ज्यादा देर तक बना रहे तो परेशानी की वजह बनता है। डिप्रेशन और तनाव से निजात पाने के लिए सबसे अच्छा उपाय भ्रामरी प्राणायाम योग होता है।

भ्रामरी प्राणायाम करने की विधि-

भ्रामरी प्राणायाम: भ्रामरी प्राणायाम को सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय करना अच्छा होता है। आप सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में आराम से बैठ जाएं। हाथो के दोनो अंगूठों को कान पर रख दें। हाथ की दो उंगलिओं को माथे पर रख दें, एवं छः उंगलियों को दोनो आँखों पर रख दे।

अब लंबी-लंबी साँसे लेते हुए अपने मुँह के कण्ठ से मधुमक्खी (भवरें) जैसी (मम……) आवाज निकाल ना शुरू करें। और नाक से मधुमक्खी की तरह गुनगुनाएं और सांस बाहर छोड़ें। सांस छोड़ते हुए “ओउम” का उच्चारण करें। सांस अंदर लेने में करीब 4-7 सेकंड और भ्रमर ध्वनी के साथ बाहर छोड़ने में करीब 20-25 सेकंड का समय लगता है। करीब तीन मिनट में 4-6 बार भ्रामरी प्राणायाम किया जा सकता है।

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भ्रामरी प्राणायाम के लाभः

  • भ्रामरी प्राणायाम से सायकीक पेंशेट्स को फायदा होता है।
  • मायग्रेन पेन, डीप्रेशन, और मस्तिष्क से सम्बधित सभी व्याधिओं को मिटाने में भ्रामरी प्राणायाम अच्छा योग माना जाता हैं।
  • मन और मस्तिषक की शांति मिलती है भ्रामरी प्राणायाम करने से।
  • ब्रम्हानंद की प्राप्ति करने के लिये भ्रामरी प्राणायाम आवश्यक हैं।
  • मन और मस्तिषक की एकाग्रता बढाने के लिये भ्रामरी प्राणायाम योग करना चाहिए।

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