ध्यान।

ध्यान-

ध्यान एक क्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने मन को चेतना की एक विशेष अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है। ध्यान का उद्देश्य कोई शरीरिक लाभ प्राप्त करना हो सकता है, या ध्यान करना अपने-आप में एक लक्ष्य हो सकता है।

‘ध्यान’ से अनेकों प्रकार की क्रियाओं का बोध होता है। ध्यान में मन को विशान्ति देने की सरल तकनीक से लेकर आन्तरिक ऊर्जा या जीवन-शक्ति का निर्माण तथा करुणा, प्रेम, धैर्य, उदारता, क्षमा आदि, गुणों का विकास आदि सब समाहित हैं।

ध्यान अलग-अलग सन्दर्भों में ‘ध्यान’ के अलग-अलग अर्थ हैं। ध्यान का प्रयोग विभिन्न धार्मिक क्रियाओं के रूप में अनादि काल से पृथ्वी पर किया जाता रहा है। ध्यान हिन्दू धर्म, भारत की प्राचीन शैली और विद्या के सन्दर्भ में महर्षि पतंजलि द्वारा विरचित योग सूत्र में वर्णित अष्टांगयोग का एक अंग है।

(Dhyaan)

यह आठ अंग:

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि है। ध्यान का अर्थ किसी भी एक विषय की धारण करके उसमें मन को एकाग्र करना आवश्यक होता है। मानसिक शांति, एकाग्रता, दृढ़ मनोबल, ईश्वर का अनुसंधान, मन को निर्विचार करना, मन पर काबू (कंट्रोल करना) पाना जैसे कई उद्दयेशों के साथ ध्यान किया जाता है।

ध्यान भारत में प्राचीनकाल से किया जाता है। ध्यान करने के लिए स्वच्छ जगह पर स्वच्छ आसन पे बैठकर साधक अपनी आँखे बंध करके अपने मन को दूसरे सभी संकल्प-विकल्पो से हटाकर शांत कर देता है। एवं ईश्वर, गुरु, मूर्ति, आत्मा, निराकार परब्रह्म या किसी की भी धारणा करके उसमे अपने मन को स्थिर करके उसमें ही लीन हो जाता है।

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ध्यान में ईश्वर या किसीकी धारणा की जाती है, उसे साकार ध्यान और किसी की भी धारणा का आधार लिए बिना ही कुशल साधक अपने मन को स्थिर करके लीन होता है। इसी क्रिया को योग की भाषा में निराकार ध्यान कहा जाता है।

ध्यान करने के लिए आवश्यक योगासन-

  • मन को निर्विचार करना।
  • स्वास-उच्छवास की क्रिया पे ध्यान केन्द्रित करना।
  • इष्टदेव या गुरु की धारणा करके उसमे ध्यान केन्द्रित करना।
  • रात्रि- प्रात:काल और संध्या का समय भी ध्यान के लिए अनुकूल है।
  • शांत और चित्त को प्रसन्न करने वाला स्थल ध्यान के लिए अनुकूल है।
  • ध्यान करने के लिए पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन और सुखासन में बैठा जा सकता है।
  • ध्यान में ह्रदय पर ध्यान केन्द्रित करना, ललाट के बीच अग्र भाग में ध्यान केन्द्रित करना।
  • ध्यान के साथ मन को एकाग्र करने के लिए प्राणायाम, नामस्मरण (जप क्रिया), त्राटक का भी सहारा लिया जा सकता है।
(Dhyaan)

स्वयं की आत्मा पे ध्यान केन्द्रित करना। और अनेक इनमें जैसी कई पद्धतियाँ है। ध्यान के साथ प्रार्थना भी कर सकते है। साधक अपने ध्यान गुरु के मार्गदर्शन और अपनी रुचि के अनुसार कोई भी पद्धति अपनाकर ध्यान कर सकता है।

ध्यान योग के अभ्यास से प्रारंभ में मन की अस्थिरता और एक ही स्थान पर एकांत में लंबे समय तक बैठने की अक्षमता जैसी परेशानीयों का सामना व्यक्तियों को करना पड़ता है। निरंतर ध्यान अभ्यास के बाद मन को स्थिर किया जा सकता है। एवं एक ही आसन में बैठने के अभ्यास से ये समस्या का समाधान हो जाता है। सदाचार, सद्विचार, यम, नियम का पालन और सात्विक भोजन से भी ध्यान में सफलता प्राप्त होती है।

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ध्यान का अभ्यास आगे बढ़ने के साथ-साथ मन शांत हो जाता है, इस को योग की भाषा में चित्तशुद्धि कहा जाता है। ध्यान में साधक स्वंय अपने शरीर, सृष्टि को भी भूल जाता है। व समय का भान भी नहीं रहता। उसके बाद समाधिदशा की प्राप्ति होती है। “हिन्दुत्व योगग्रंथो” के अनुसार ध्यान से कुंडलिनी शक्ति को जागृत किया जा सकता है और साधक को कई प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त होती है। पतंजलि योग में मुख्य आठ प्रकार की शक्तियों का वर्णन किया गया है।

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